Kashmir Ki Kali 0

I will charge more than the hero – O P Nayyar

“Shakti Samanta had come to me with a need for a film. I asked what is the story? So he started saying that you should make songs, we will build the story around them. OK, how many songs do you need? Said that at least make 10. I said ok but there are 2 conditions. One, I will charge more than the hero and the other’s songs will be shot in front of me”. Shakti Samant ji accepted all the conditions. After all, before this, he had already made a hit film Howrah Bridge with OP Nayyar.

सुरमित्रों,

हाय रे हाय ये मेरे हाथ में तेरा हाथ मेरी जां बल्ले बल्ले, भारतीय जनमानस के रग रग में संगीत रचा-बसा हुआ है। विश्व में आश्र्चर्य व्यक्त करते हैं कि आप की फल्मों में हर जगह गाने क्यों? कारण  क्रमांक 1: विश्व में केवल और केवल भारतीय संगीत ही एकमात्र है जिसमें हर प्रहर, हर रस, हर शास्त्र, हर भाव पर संगीत है, जिसे हम भारतीय शास्त्रीय संगीत कहते हैं। कारण  क्रमांक 2: बच्चे पूरे संसार में जनम लेते हैं पर ढोल तो केवल भारत में ही बजते हैं। शादियां पूरे संसार में होती हैं पर गोद भराई, माता पूजन, चौकी पूजन, मेहंदी, सुहागनें, बिदाई, गारी केवल भारत में ही गाई जाती हैं। कारण क्रमांक 3: भारतीय सभ्यता में जितने देवी-देवता हैं, सबकी तिथियाँ निश्चित हैं। ऐसी कोई भी तिथि-जयंती संगीत रहित नहीं है। सम्भवतः करोड़ों देवी देवताओं के भजन पूजन में हम वर्ष भर व्यस्त रहते हैं तो इसी संगीत के भरोसे। भारत के भिन्न भिन्न प्रान्त,भाषाएं, प्रांतीय रीति रिवाज, तीज त्यौहार, मेले-ठेले सभी तो संगीतमय हैं। ऐसे में हमारी फ़िल्में कैसे अछूती रहती इन गीतों से। आखिरकार हमारे चरित्र, कथानक, घटनाएं, पर्व, स्थल सभी तो इन्हीं गीतों के माध्यम से अपनी बात कहते हैं।

भारतीय चित्रपट जगत, विशेषतः हिंदी फ़िल्म संगीत में विभिन्न मिट्टियों का संगीत सुगन्धित है। नौशाद अली, मदनमोहन, रोशन के संगीत में उत्तर प्रदेश बसता है, तो चित्रगुप्त के संगीत में अवध-भोजपुरी की सौंधी सुगन्ध है। दादा सचिन देवबर्मन, हेमंत दा, सलिल दा के संगीत में अविभाजित बांग्ला पूर्वोत्तर का लोक संगीत महकता है तो कल्याणजी-आनंद जी के संगीत में गुजरात। वसन्त देसाई, सी रामचन्द्र, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के संगीत में पश्चिमी पट्टी का असर है तो शंकर-जयकिशन के संगीत में सम्पूर्ण भारत का लोक संगीत। अन्य गुणी संगीतकारों ने भी समय समय पर मिट्टी के संगीत की सुगंध बिखेरी है।

 

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यही आज का विषय है कि कैसे हमारे निर्देशकों ने ऐसे ऐसे कथानक, चरित्र जान के अपनी फिल्मों में रखे जहाँ संगीतकारों को ये लोक संगीत विधा सुनाने का अवसर मिला। इस कड़ी में आपने गौर किया कि पंजाब का ज़िक्र अभी तक नहीं आया! तो वो इसलिए नहीं आया कि जैसे पंजाब, भारत का ताज है वैसे ही पंजाबी संगीत भी लोक संगीत में शीर्षस्थ है।

माना जाता है कि आर्यन सभ्यता ने सर्वप्रथम पंजाब में अपनी जड़ें जमाई थीं। तभी पंजाबियों के कद, काठी, रंग, रूप आप अलग से ही पहचान बनाते हैं। पंजाबी सभ्यता में भी वर्ष भर के क्रिया कलापों में संगीत समाया हुआ है। यदि पंजाबियत की बात आये तो फिर श्रद्धेय ओ पी नैयर, मोहम्मद रफ़ी साहब का नाम न आये? तो ये असम्भव है।

ओ पी नैय्यर जी को मैं डैडी कहता था और इस संबोधन की आज्ञा उनसे मैंने प्रथम भेंट में ही ले ली थी। कृतघ्नता होगी यदि मैं अपनी उस मित्र का जिक्र न करूं जो डैडी की महिला मित्र थीं। मैं उनकी निजता का सम्मान करूँगा व उनके नाम को अपने दिल में रख, मतलब की बात करूंगा कि एक दिन, अनायास उसने मुझे पूछा? ओ पी नैय्यर से मिलोगे विनीत?

अंधा क्या चाहे? दो आँखें!! कौन नहीं मिलना चाहेगा? मैंने कहा, पर तुम कैसे मिलाओगी? तुम क्या जानती हो उनको? चलो आज ही, उन्होंने कहा, मैं तो लगभग रोज ही जाती हूँ। तय समय पर हम जा पहुँचे विरार वेस्ट। तब उन्होंने अपने चर्चगेट वाली शारदा बिल्डिंग तज दी थी और वो उसका कोर्ट केस हार गए थे। धड़कते हुए दिल से उनका सामना हुआ कि कहीं मुझे भगा न दें। मैं मध्यप्रदेश से हूँ, तो ये सुन कर उन्होंने शिवपुरी की बात पूछी। थोड़ी देर में हम सब at ease हो चले। मैंने जान के कोई संगीत की बात नहीं की और ना ही उन्होंने की। इसके बाद ये श्रद्धा भेंट के अवसर विरार से ले के नव पाड़ा ठाणे तक आते रहे।

उन्हें संगीत को छोड़ कर सभी बातें पसन्द थीं, तो इधर उधर की बातों के बाद एक दिन मैंने आर्यन सभ्यता की बात जान के छेड़ी। ये सुनना ही था कि डैडी के आँखों में एक चमक सी आ गई। बोल पड़े, अरे जनाब, आर्य सबसे पहले पंजाब में बसे। आप देखें, वहाँ के लोगों का रंग, रूप, कद,काठी, साफ लहज़ा, मीठी ज़ुबाँ और वहाँ का संगीत। बस यही वो point था जिसकी मैं प्रतीक्षा कर रहा था। कहने लगे के, देखना ये कहरवे की चलत वाली टीपदार पंजाबी रिदम एक दिन सर चढ़ेगी सबके। अजी हमारे पंजाब में तो दूल्हे का सेहरा गाया जाता है, जब वो घोड़ी चढ़ता है तो घोड़ियां, और दुल्हनें शादी के बाद गिद्धा गाती हैं। साल भर के तीज त्यौहार बैसाखी, माही, लोहड़ी में सुनो क्या जबरदस्त धूम संगीत होता है। मैंने तो जुगनी, माहिया टप्पे, ढोला, काफिया, बोलियाँ जैसे रुमानियत से भरे और दुल्ला भट्टी में जोश खरोश से सरोबार गाने बनाये हैं।

आपके शक्ति सामंत मेरे पास एक फ़िल्म की दरकार ले के आये थे। मैंने कहा कि कहानी क्या है? तो कहने लगे आप तो गाने बनाओ। कहानी हम उनके आसपास बना लेंगे। ठीक है, कितने गाने चाहिए? बोले कि कम से कम 10 तो बना दें। मैंने कहा ठीक है पर 2 शर्तें हैं जी। एक तो मैं हीरो से ज़्यादा पैसे लेता हूँ और दूसरे के गाने मेरे सामने शूट होंगे। मान गए सारी शर्तें शक्ति सामंत जी। आखिर इसके पहले वे ओपी जी संग एक हिट फ़िल्म हावड़ा ब्रिज बना चुके थे।

Kashmir Ki Kali 5एक दिन मुझे कहा कि आपने एक भांगड़ा की धुन सुनाई थी, मुझे तो वो चाहिए। मैंने कहा कि आपने न फ़िल्म की कहानी बताई न नाम। बोले नाम तो है, कश्मीर की कली। यार, कश्मीर की कली में भांगड़े का क्या काम? कश्मीर में तो कूड, रऊफ, नग्मा वगैरह होते हैं। कहने लगे कोई बात नहीं हम कहानी में बैसाखी के मेले की सिचुएशन बना लेंगे फिर भांगड़ा रखेंगे। ठीक है जनाब, लीजिए भांगड़ा बना देते हैं। तो मैंने ग्यारहवीं तर्ज़ बना दी। Interlude में वापस अल्गोजे, मेंडोलिन वाले interlude को ही रिपीट किया गया है। भरपूर तालियों से भांगड़ा अब चरम पर जा पहुंचा है। रिदम अरेंजर जी एस कोहली के निर्देशन में जो ढोलक नवाज़ इस भांगड़े में हैं, वो एक दिग्गज हैं, नायाब हीरे हैं हमारी सिने संगीत इंडस्ट्री के श्रद्धेय उदयकुमार दुबे। दुबे जी की ढोलक का एक लंबा चमकीला करियर रहा है बर्मन साहब से आनंद मिलिंद, जतिन ललित के संग।

“हो ओ हो ओ हो, जब से दिल में तेरी तस्वीर बनी है” यहाँ दुबे जी के 2 ठेके ग़र नहीं सुने तो जीवन बेकार है भैया। यूँ लगता है जैसे तकदीर बनी है, अल्गोजे से फिर विभाजित किया Melody ostinato को. हो ओ ओ हो ओ हाय जब से तू इस दिल का मेहमान हुआ है, जीवन में खुशियों का सामान हुआ है”. सर्वविदित है कि शम्मी जी को कोरियोग्राफर नहीं लगता था। वे अपने खुद के स्टेप्स तय करते थे। देखिये क्या फिरकी लेते हुए भांगड़े में घुसे हैं। रफ़ी साहब की आवाज़  जितनी दूर नज़र में डालूं, चारों तरफ बहार है।

विस्मयादिबोधक यानी interjection जैसे, हाय,ओय, होय, अह, अहह, ओह, इस किस्म के interjections हर कोई नहीं गा सकता। इसके लिए स्वर नाट्यशास्त्र व्याकरण का ज्ञान होना आवश्यक है। विशेष, भांगड़े के अंत को पकड़ें। अचानक दुबे जी अपनी ढोलक के टेम्पो को द्रुत गति देते हैं और भांगड़ा भी चपल हो जाता है। यहाँ आशाजी, रफ़ी साहब राग वृन्दावनी सारंग के अलाप को लेते हैं जिसपे शम्मी संग शर्मिला एक कैलन्डर पोज़ देते हैं।

शास्त्रीयता से बचते तत्काल दोनों भांगड़े की मस्ती में हुर्रर, बल्ले बल्ले के बाद जो रफ़ी साहब ने धूम चिक धूम ता में जो कहरवे कि मात्राएं गायीं हैं और फिर धींगा मस्ती में कुछ बोला है वो न भूतो न भविष्यते है। मज़ेदार बात ये के इस घालमेल को किसी ने भी पकड़ा नहीं के कश्मीर की कली में पंजाब की मुंडा-कुड़ी कैसे? सिवाय ओपी नैय्यर के।

आपका सुरमित्र

विनीत श्रीवास्तव

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